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ट्यूब लाइट समीक्षा हिंदी मूवी रिव्यु ( Tubelight Review in Hindi)

Tubelight Review  in Hindi (ट्यूब लाइट हिंदी मूवी रिव्यु)

Tubelight Review  in Hindi

Average Ratings:2.8/5 
Score: 75 % Positive
Reviews Counted: 5
Positive:3
Neutral: 1
Negative:1

Ratings:3/5 Review By:Ajay Brahamtej Site:Dainik Jagran

लेखक-निर्देशक का जोर दूसरी बारीकियां से ज्‍यादा मुख्‍य किरदारों के बात-व्यवहार पर टिका है। उसमें वे सफल रहे हैं। यह फिल्‍म पूर्वार्द्ध में थोड़ी शिथिल पड़ी है। निर्देशक लक्ष्‍मण को दर्शकों से परिचित करवाने में अधिक समय लेते हैं। 51 साल के सलमान खान और उनसे कुछ छोटे सोहेल खान अपनी उम्र को धत्‍ता देकर 25-27 साल के युवकों की भूमिका में जंचने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी कद-काठी धोखा देती है। ‘ट्यूबलाइट’ के सहयोगी किरदारों में आए ओम पुरी, मोहम्‍मद जीशान अय्यूब, यशपाल शर्मा, जू जू और माटिन रे टंगू फिल्‍म की जमीन ठोस की है। वे अपनी भाव-भंगिमाओं से फिल्‍म के कथ्‍य को प्रभावशाली बनाते हैं। खास कर जू जू और माटिन बेहद नैचुरल और दिलचस्‍प हैं।

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Ratings:3.5/5 Review By:R J Alok Site:Aaj Tak

सलमान खान का नाम जहन में आते ही आप के सामने दबंग खान, सुल्तान और ताबड़तोड़ एक्शन करने वाले इंसान का चेहरा नजर आता है, लेकिन आपको यह सारी चीजें इस फिल्म में नहीं दिखाई देंगी.फिल्म का स्क्रीनप्ले भी काफी बिखरा-बिखरा सा नजर आता है जिसे भली भांति अच्छे तरीके से पेश किया जाता तो कहानी किसी और लेवल की होती. फिल्म की सोच अच्छी है लेकिन उसे पूरी तरीके से दर्शा पाने में मेकर असक्षम दिखते हैं.फिल्म काफी इमोशनल है लेकिन कई बार ऐसे कई सीन आते हैं जिसमें इमोशन तो होता है लेकिन इमोशनल फील एक दर्शक के तौर पर महसूस नहीं होती, जिस पर काम किया जाना बहुत जरूरी था.फिल्म का क्लाइमेक्स काफी प्रेडिक्टेबल सा है जिसे और दिलचस्प किया जाता तो देखने का अलग मजा होता.

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Ratings:2.5/5 Review By:Prashant Site:NDTV Khabar

मुझे इस फिल्‍म की दूसरी खूबी लगी इसका विषय, जिसका प्रमुख संदेश है कि अगर आपको खुद पर यकीन है तो आप चट्टान भी हिला सकते हैं. हालांकि यह फिल्‍म हॉलीवुड फिल्‍म ‘लिटिल बॉय’ से प्रेरणा लेकर बनी है तो यह संदेश भी उसी फिल्‍म से लिया गया है. इसकी तीसरी खूबी है इसका संगीत और गाने. फिल्‍म के गाने अच्छे हैं. दिवंगत अभिनेता ओम् पूरी की ये आखिरी फिल्‍मों में से एक है और उनका किरदार और काम दोनों ही काफी अच्‍छे हैं. एक्‍टर ब्रजेंद्र काले की भी एक्टिंग फिल्‍म में काफी अच्‍छी है. ‘ट्यूबलाइट’ को मेरी तरफ से मिलते हैं 2.5 स्टार.

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Ratings:3/5 Review By:Dainik Bhaskar Site:Dainik Bhaskar

सलमान खान ने इस फिल्म में बहुत ही उम्दा अभिनय किया है और यह उनके करियर की सर्वोत्तम फिल्मों से एक कही जा सकती है। उनके चेहरे की मासूमियत और उनकी आंखों में पानी कुछ लोगों की आंखें नम भी कर सकता है। सलमान के अलावा मंझे हुए कलाकार ओम पुरी हैं, जो अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका काम भी काफी दिलचस्प है। चाइल्ड आर्टिस्ट मेटिन ने भी बढ़िया काम किया है। चाइना मूल की एक्ट्रेस जू जू का काम भी बेहतरीन है। मोहम्मद जीशान अयूब ने सराहनीय काम किया है। शाहरुख खान का कैमियो भी करेक्ट समय पर आता है, जो सरप्राइज़ करता है।

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Ratings:2/5 Review By:Ravi Bule Site:Amar Ujala

हल्के रोशनीदार मनोरंजन में आप खुश हो सकते हैं कि ट्यूबलाइट पर सलमान खान ब्रांड चिपका है तो फिल्म से काम चला लें। वर्ना इसे देखने की ठोस वजह नहीं है। बजरंगी भाईजान में सशक्त कहानी लाने वाले निर्देशक कबीर खान यहां कमाल नहीं करते। मैदान-ए- जंग में इमोशन जगाना उनकी खूबी है, परंतु वह जादू यहां गायब है। लेकिन सलमान के जिन कंधों पर दारोमदार था, उन्हें डायरेक्टर ने कमजोर कर दिया। ट्यूबलाइट नहीं जली। सलमान को रिलीज के बाद एहसास होगा कि कबीर ने चीटिंग की क्योंकि दर्शकों को यही लगता है। यह वह सलमान नहीं, जो सुपरस्टार है।

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ट्यूब लाइट Story:  

ट्यूबलाइट कबीर खान द्वारा निर्देशित एक आगामी भारतीय ड्रामा फिल्म है, जिसके निर्माता कबीर खान और सलमान खान हैं। सलमान खान तथा झू झू अभिनीत इस फिल्म की कहानी 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय की है।

ट्यूब लाइट Release Date:

Jne 23 2017

 निर्देशक: कबीर खान

 निर्माता: सलमान खान

अभिनेता:
सलमान खान – लक्ष्मण
झू झू
सुहेल ख़ान – (भरत)
मुहम्मद जीशान अय्यूब
ओम पुरी
शाहरुख़ खान – (जादूगर)

Run Time:  2 hours and 16 Minutes

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3 Comments

  1. Naam tubelight ka story Sultan ki very good admin

  2. ट्यूबलाइट:
    यकीनन…ख़राब फिल्म-खराब एक्टिंग! [1.5/5]

    'ट्यूबलाइट' के होने की वजह मेरे हिसाब से 'बजरंगी भाईजान' की कामयाबी में ही तलाशी गयी होगी. चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने कबीर खान के हाथ अब एक ऐसा अमोघ फार्मूला लग गया था, जिसमें बॉक्स-ऑफिस पर सिक्कों की खनक पैदा करने की हैसियत तो थी ही, आलोचकों और समीक्षकों का मुंह बंद कराने की ताकत और जुड़ गयी. एक सीधी-सादी दिल छू लेने वाली कहानी, थोड़ा सा 'बॉर्डर-प्रेम' का पॉलिटिकल तड़का, चुटकी भर 'बीइंग ह्यूमन' का वैश्विक सन्देश और साफ़ दिल रखने की तख्ती हाथों में लेकर घूमते एक बेपरवाह 'भाईजान'. 'ट्यूबलाइट' बड़े अच्छे तरीके और आसानी से इसी ढर्रे, इसी तैयार सांचे में फिट हो जाती है, पर जब आग में तप कर बाहर आती है तो नतीज़ा कुछ और ही होता है. मिट्टी ही सही नहीं हो, तो ईटें भी कमज़ोर ही निकलती हैं.

    कुमाऊँ के एक छोटे से गाँव में गांधीजी कहकर गये, "यकीन से कुछ भी हासिल किया जा सकता है". ट्यूबलाइट की तरह, देर से दिमाग की बत्ती जलने वाले लक्ष्मण (सलमान खान) की सुई इस 'यकीन' पर आके कुछ ऐसे अटक गयी कि सालों बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध में लापता भाई (सोहेल खान) की वापसी के लिए भी, लक्ष्मण उसी 'यकीन' की तरफ टकटकी लगाये देख रहा है. कबीर खान कहानी की इस ठीक-ठाक नींव को मज़बूत करने में थकाऊ धीमी गति और पकाऊ भाषणों से इतना वक़्त खपाते हैं कि फिल्म का वो ज़रूरी पैग़ाम देने में देर हो जाती है, जहां चीनी मूल के भारतीय माँ-बेटे लीलिंग और गुओ (ज़ू ज़ू और माटिन रे तंगु) को गांववाले चीनी समझकर नस्ली भेदभाव दिखाने लगते हैं. लक्ष्मण खुद गुओ को 'गू' कहकर बुलाता है, और एक दृश्य में तो गुओ को 'भारत माता की जय' बोल कर हिन्दुस्तानी होने का सबूत देने को भी कहता है. आज के दौर में, जब सेना के जुझारूपन और हर किसी के 'देशभक्त' होने, न होने की पिपिहरी पूरे देश में जोरों से बज रही है, कबीर खान भारतीय सेना के एक अधिकारी (यशपाल शर्मा) से युद्ध-विरोधी बातें कहलवाने की हिम्मत तो जरूर दिखाते हैं, लेकिन सब कुछ बेदम, बनावटी और बेअसर!

    फिल्म में बहुत कुछ बेढंगा और वाहियात है, जो आपको लगातार परेशान करता रहता है. कुमाऊँ का यह गाँव फिल्मी सेट लगने-दिखने की हद से बाहर जा ही नहीं पाता. फिल्मों में 80 के दशक के गाँव और वही 25-50 चेहरे, जो हर जगह भीड़ का हिस्सा बनकर चौराहे पर डटे रहते थे, बेबस याद आ जाते हैं. कैलेंडर पर '62 भले ही चल रहा हो, गाँववालों की बातचीत के लहजे में 'चाइना', 'ज़िप', 'गैप' और तमाम अंग्रेज़ी के शब्द बड़ी बेशर्मी से कानों में सुनाई देते रहते हैं. फिर आती हैं मशहूर चीनी अभिनेत्री ज़ू ज़ू. मुझे कोई वजह समझ नहीं आती कि उनकी जगह कोई दूसरी (नार्थ-ईस्ट की) भारतीय अभिनेत्री क्यूँ नहीं हो सकती थी? जैसे उनके बेटे की भूमिका में माटिन रे तंगु अरुणाचल प्रदेश से ही हैं. 'मैरी कॉम' में प्रियंका चोपड़ा की कास्टिंग जैसी ही कुछ भयानक गलती है ये.

    …पर फिल्म में एक पॉइंट पर आकर आपको ये सारी शिकायतें बहुत छोटी लगने लगती हैं, जब आप फिल्म के मुख्य कलाकार सलमान खान को एक के बाद एक हर दृश्य में अभिनय के नाम पर कुछ भी आढ़े-टेढ़े चेहरे बनाते हुए देखते हैं. कबीर उनके किरदार को परदे पर रोते हुए पेश करने में ज्यादा मेहनत दिखाते हैं, पर हमें रोना आता है तो सिर्फ सलमान की अभिनय में नाकाम कोशिशों से. फिल्म में सलमान अपने यकीन से पहाड़ भी हिला देते हैं, ऐसा ही कोई यकीन उन्हें अपने अभिनय में भी दिखाना चाहिए. कभी-कभी ही सही. मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे मंजे कलाकार के लिए फिल्म में बहुत कुछ करने को नहीं है, पर एक दृश्य में जब वो सलमान के किरदार को थप्पड़ जड़ रहे होते हैं, लगता है सलमान को जैसे सज़ा मिल रही हो, अच्छी एक्टिंग न करने की, उससे जो शायद फ़िल्म में सबसे अच्छी कर रहा हो. सोहेल खान बड़ी समझदारी से फिल्म में आते-जाते रहते हैं, तो उनसे न तो ज्यादा उम्मीदें बनती हैं, न ही शिकायतें. शाहरुख एक दृश्य में आते तो हैं, पर उनसे भी किसी करिश्मे की कोई आस नहीं जगती.

    आखिर में; 'ट्यूबलाइट' में कबीर खान अपने 'बजरंगी भाईजान' वाले फ़ॉर्मूले को बॉक्स-ऑफिस पर दोबारा भुनाने की कोशिश करते हैं, पर ठीक वैसे ही औंधे मुंह गिरते हैं, जैसे 'एक था टाइगर' के बाद 'फैंटम'. रही बात यकीन की, तो मुझे यकीन है कि भाई एक दिन एक्टिंग करनी सीख ही जायेंगे, तब तक के लिए भेजते रहिये 'ईदी'…और बिजली में कटौती, रौशनी में बढौती के लिए अपनाईये एलईडी! [1.5/5]

  3. loved this unbiased honest review.

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