Raag Desh Movie Review |Bollymoviereviewz
Thursday, August 3, 2017

Raag Desh Movie Review

Raag Desh Movie Review 

Average Ratings: 2.68/5
Score: 43% Positive
Reviews Counted: 7

Ratings:3.5/5 Review By:Rohit Site:Hindustan Times
There is a strange thing about patriotic films. You know what’s going to happen, but your eyes still get moist when it happens. The same will happen to you as well when Kadam Kadam Badhaaye Jaa will play on the screen. This 137-minute soldier versus traitor story is totally worth your time.
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Ratings:2/5 Review By:Shubhra Site:Indian Express
The film revolves around the creation of Subhash Chandra Bose’s Indian National Army, and its short-lived but powerful impact. But it is not what it promises to be: the convincing origin story of one of the most fascinating parts of Indian history, and how the soldiers of the INA, were, in a manner, a fraught bridge between the Indian freedom struggle and the British efforts during the second World War.
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Ratings:2.5/5 Review By:SameekshaSite:News 18
Thumbs up for bringing in front the lesser-known story from Netaji's forgotten books, thumbs down for not making it engaging enough. Also, in the end, it does make you feel the air of current political scenario. Why only during the saffronisation of the country, one thought of bringing the 'true nationalist' story at the front? A story which in a very subtle way, points finger at the functioning of Indian National Congress right from the fall of British era. Propaganda much? Well, it's for the audience to find out.
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Ratings:3.25/5 Review By:DevanshSite:Firstpost
Overall, Raag Desh is not a superlative film, particularly because of its treatment, editing and lack of a novel story. But what it excels at is brushing the dust off a forgotten chapter of the history textbooks in a way that we can revisit it, with equal amounts of pride and gratitude.
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Ratings:2.5/5 Review By:Rohit BhatnagarSite:Deccan Chronicle
On the whole, Raag Desh is an average film with an untold factual story. The film could have been much better plus in the era of commercial films, Raag Desh is a niche in its own genre. If you are still patriotic to watch such a film in 2017, then Raag Desh isn't a bad watch.
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Ratings:3/5 Review By:Nihit BhaveSite:TOI
It gives you numbers and dates and facts and suddenly introduces relatives of the protagonists who have stories of their own. It’s death by information.Had the movie been freed of its half-hearted side-tracks it would have made for great infotainment. It is only half of that word now..
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Ratings:2/5 Review By:Ahana Bhattacharya Site:Koimoi
I entered the theatre with a lot of expectations from a film about a chapter from the life of Netaji Subhash Chandra Bose, the man who had immense contributions to India’s freedom movement. But poor execution ruined the film and terrible editing made it absolutely difficult to understand.This Tigmanshu Dhulia directorial will not appeal to every kind of viewer and I’m afraid not everybody will be able to understand or follow it.
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Raag Desh Story:  

The film is a period drama, based on the Indian National Army set up by Netaji Subhash Chandra Bose and the war to liberate India from the British Government which was fought on the shores of the Irrawaddy in Burma. The British Government called the soldiers of the INA "renegades and japanese stooges", and a trial was held at the Red Fort in Delhi, which was called the Red Fort Trials of 1945. Raag Desh brings to life that epic trial which paved the way for India's freedom.

Raag Desh Release Date:

July 28, 2017 ( India)

 Director: Tigmanshu Dhulia

 Producer: Gurdeep Singh Sappal

Kunal Kapoor Amit Sadh Mohit Marwah

Run Time:  2 hours and 15 Minutes

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  1. राग देश:
    देश का राग, अपने असली सुर में! [3/5]

    देशभक्ति में ओत-प्रोत बहुत सारी फिल्में आपको याद होंगी. 'बॉर्डर', 'क्रांति' जैसी कुछ चीख-चीख कर दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने वाली जोशीली, और कुछेक '1971', 'विजेता' जैसी ठहरी हुई; जिनके रोमांच की बुनियाद सिर्फ और सिर्फ एक दमदार कहानी पर टिकी होती है, जो कभी-कभी इतिहास की क्लास जैसी उबाऊ भी लग सकती है, पर कहानी कहते वक़्त ईमानदार बने रहने की कोशिश कभी नहीं छोड़तीं. तिग्मांशु धूलिया की 'राग देश' जैसे किसी केस-फ़ाइल की तरह, पूरी तरह जाँची-परखी और एक संतुलित-संयमित देशभक्ति फिल्म है. उम्मीद ये कतई ना करें कि यहाँ आपका हीरो अकेले दुश्मन के ऊपर टूट पड़ेगा, ना ही कि जंग की मुश्किल घड़ियों में पर्स टटोलेगा और प्रेमिका की फोटो पर उंगलियाँ फिराते हुए गाना गाने लगेगा.

    'राग देश' इतिहास के किसी जरूरी चैप्टर की तरह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आज़ाद हिन्द फौज़ और उससे जुड़े 3 ख़ास सेनानियों पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा चलाये जाने वाले देशद्रोह के मुकदमे का परत-दर-परत ब्यौरा पेश करता है. दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के आगे घुटने टेक देने के बाद, बर्मा में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सेना की एक टुकड़ी जापानियों के सुपुर्द कर दी थी. जापानियों की मदद से, आज़ाद हिन्द फौज़ की नींव वहीँ पड़ी और धीरे-धीरे बुलंद होती गयी. देश आज़ाद कराने की लड़ाई में अब हिन्दुस्तानियों की ही बन्दूक थी, और हिन्दुस्तानियों का ही सीना. तमाम छोटी-छोटी सफलताओं के बावजूद और नेताजी की असामयिक मृत्यु के बाद, आज़ाद हिन्द फौज बिखरने लगी और अब उसके 3 अधिकारियों मेजर जनरल शाहनवाज़ खान (कुनाल कपूर), लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों (अमित साध) और कर्नल प्रेम सहगल (मोहित मारवाह) पर देशद्रोह और मर्डर का मुकदमा चल रहा है.

    फिल्म की शुरुआत में ही, तिग्मांशु धूलिया बड़ी समझदारी से अपनी आवाज़ में 1945 के भारत की तस्वीर पूरी तरह साफ़ कर देते हैं. कोर्ट की प्रक्रिया के साथ-साथ धीरे-धीरे गवाहों के बयानात के ज़रिये, धूलिया आज़ाद हिन्द फौज के गठन और सैनिकों के साथ नेताजी के प्रेरक-प्रसंगों को फ्लैशबैक में पेश करते हैं. धूलिया फिल्म में मनोरंजन का भी ख़ास ख्याल रखते हैं, पर कुछ इस तरह जो अटपटा न हो, और कहानी की गंभीरता से बहुत ज्यादा अलग भी नहीं. कर्नल सहगल के पिता (कंवलजीत सिंह) पंडित नेहरु से वकील बदलने की बात कर रहे हैं, नेहरूजी का जवाब आता है, "कहीं आपका इशारा मेरी तरफ तो नहीं?", सहगल साब साफ़ मना कर देते हैं, "आप राजनीतिक मामलों में तो ठीक है, पर सेना के मामलों में आपके पास ज्यादा कुछ अनुभव नहीं है". इसी तरह कर्नल प्रेम सहगल की हाज़िर-जवाबी और अंग्रेजों के साथ लेफ्ट. कर्नल ढिल्लों की नोक-झोंक रह-रह कर आपको गुदगुदाती रहती है. कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (मृदुला मुरली) के साथ कर्नल प्रेम सहगल के प्रेम को परदे पर कम ही वक़्त मिल पाता है.

    'राग देश' की खासियत है उसका रिसर्च-वर्क, जो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के बजाय ज्यों का त्यों सामने धर देता है, चाहे उसे जानने में आपकी कोई मंशा हो, न हो. फिल्म के किरदार अगर पंजाबी, जापानी, ब्रिटिश हैं तो वे अपनी ही भाषा में बात करते हुए सुनाई देते हैं. फिल्म न सिर्फ विवादास्पद प्रसंगों से बचती है, बल्कि नेताजी के कुछ बहुत ही भावुक पलों को बड़ी ख़ूबसूरती से सामने रखती है, जो आज के वक़्त में प्रासंगिक भी हैं, और प्रेरणास्पद भी, जैसे बर्मा में मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की कब्र पर चादर चढ़ाते हुए वादा करना कि एक दिन आपको हिंदुस्तान लेकर जायेंगे, जैसे मंदिर से दर्शन के बाद निकलते हुए माथे से तिलक का निशान मिटाना ताकि देश की लड़ाई में किसी एक धर्म की हिस्सेदारी न लगे. कास्टिंग में कुनाल, अमित और मोहित एकदम ठीक-ठीक हैं, अन्य कलाकारों में केनेथ देसाई मजेदार हैं.

    आखिर में; 'राग देश' ऐसे मुश्किल वक़्त में जब देशभक्ति को लेकर सबके अपने अपने पैमाने हैं, आज़ादी की लड़ाई की एक सच्ची कहानी, एक सच्ची घटना को पूरी शिद्दत और नेकनीयती से सामने रखती है. मसाले कम हैं, तो थोड़ी बोरियत और सूनापन जरूर घेरने की कोशिश करेगा; मगर फिल्म की तमाम अच्छाइयों के बीच इसे नज़रंदाज़ करना इतना मुश्किल नहीं. [3/5]

  2. Thanks Gaurav for reviewing this movie.


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