Hindi Medium Movie Review |Bollymoviereviewz
Wednesday, May 24, 2017

Hindi Medium Movie Review

Hindi Medium Review

Hindi Medium Review
Average Ratings: 3.25/5
Score: 75% Positive
Reviews Counted: 9
Positive:6
Neutral:1
Negative:2




Ratings:2.5/5 Review By:Rajeev Masand Site:CNN News18
Despite its shortcomings, the film is never unwatchable and benefits enormously from a winning performance by Irrfan Khan who makes his every moment on screen count. From his hilarious wooing of a mother-daughter pair of potential customers at his shop in the film's first half to his earnest amends on discovering his conscience late into the final act, he has you eating out of his palm. For Irrfan alone, Hindi Medium may be worth a watch. I'm going with two-and-a-half out of five.
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Ratings:-- Review By:Taran Adarsh Site:Twitter
OneWordReview...Hindi Medium: Wonderful. HindiMedium looks at the education system... A relevant and topical film... Makes you laugh, makes you emotional... Truly heartwarming!Dear Irrfan, is there any character you cannot portray? Such brilliance and versatility is rare. You sparkle yet again in #HindiMedium...
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Ratings: 3/5 Review By:Mayank Shekhar Site:MidDay
Except given the seriousness of the subject, he takes the more tried-and-tested Rajkumari Hirani formula of a story that's part humour, part farce, but keeps you engaged, and nudges you to think. Most of it works. Some of it doesn't. While being crowd-friendly, the film lapses into simplicities, such as that of seeing only virtue in the poor, while the rich usually comprise pretentious a-holes.And the picture very passionately makes a point that could well be a polished mirror to the audience before it. I'm glad I caught it.
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Ratings:2/5 Review By:Shubhra Gupta Site:Indian Express
As usual, it’s the marvelous Irrfan who keeps us watching. His is a fine, well-judged performance, which rises above the lines. At one point, we see him cracking up while watching his favourite florid TV serial : in that moment, ‘Hindi Medium’ is glorious, because the actor catches what he’s meant to do, meant to be, gloriously.. What happened to that tone in the rest of the film?
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Ratings:4/5 Review By:Madhureeta  Site:TOI
At the core, the film deals with a very relevant subject of how language divides our society. How angrezi-speaking people in India are touted to be ‘premium class,’ while the Hindi-waale¸ however illustrious or wealthy, are low-brow, or plain uncool. Hindi Medium shines in two areas that most of our films often fall short of. As far as the story goes – good writing, and as far as comedy goes – great timing.
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Ratings:3/5 Review By:Sreehari Site:Rediff
Hindi Medium works because it somehow manages to stretch itself beyond its scrubby elements, easy half-baked jokes, lessons about consumerism and our love for English, into a simple story about a boy who would do anything to see his girl smile. There's an oasis of sanity there.
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Ratings:3.5/5 Review By:Rohit Site:Hindustan Times
A little preachy and over-dramatic towards the end, Hindi Medium strongly drives its point home. Chaudhary’s film has immense repeat value. You are likely to empathise with Qamar when she says, “Iss desh me angrezi zabaan nahi class hai,” (English is not a language but class in this country). And if you don’t then you might be a part of the group that wants the status quo.
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Ratings:4/5 Review By:Hungama  Site:BollywoodHungama
On the whole, HINDI MEDIUM looks at the workings of the education system. It is a relevant and topical film that makes you laugh and get emotional at the same time. At the Box Office, the movie will be appreciated by the classes as well as the masses. Strongly recommended.
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Ratings:4/5 Review By:Ahana Bhattacharya Site:Koimoi
This is a film with which every Indian student and parent will be able to relate. Kudos to the makers for highlighting the way education is being turned into a business (which only the rich can afford) in our country. At the same time, it points out the plight of government schools where the major concern is not just lack of infrastructure and facilities but also the lack of students. I go with four stars for this one!
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Hindi Medium Story:  

A couple want to give their daughter the best education so she will be accepted by the elite.

Hindi Medium Release Date:

May 19, 2017 ( India)

 Director:   Saket Chaudhary

 Producer:  Bhushan Kumar, Krishan Kumar, Dinesh Vijan

Cast:
Irrfan Khan
Saba Qamar
Deepak Dobriyal

Run Time:  2 hours and 30 Minutes


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2 comments:

  1. हिंदी मीडियम:
    ‘क्लास’ की क्लास, और क्लास की एक्टिंग! [3.5/5]

    बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर आजकल माँ-बाप कुछ ख़ासा ही जागरूक हो गए हैं. जिंदगी एक दौड़ है, और इस दौड़ में पीछे रह जाने वालों के लिए कोई जगह नहीं, इस पागलपन को सर पे लादे बेचारे माँ-बाप बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए क्या-क्या कर गुजरने का जोखिम नहीं उठाते, पर ध्यान से देखें तो इतनी भी बेचारगी नहीं है. खेल सब किया कराया है, उस एक छोटी समझ का, जिसके हिसाब से बच्चों की कामयाबी का सारा दारोमदार फर्राटेदार इंग्लिश बोलने की चाहत से शुरू होकर शहर के सबसे बड़े, सबसे महंगे स्कूल में एडमिशन मिल जाने तक ही सीमित है. इक जद्दो-जेहद समाज के ऊँचे तबके तक पहुँचने की. साकेत चौधरी की ‘हिंदी मीडियम’ माँ-बाप के उसी अँधाधुंध भाग-दौड़ को बड़े मनोरंजक तरीके से आपके सामने रखती है.

    राज बत्रा (इरफ़ान खान) चांदनी चौक में कपड़ों की दुकान चलाता है. रहने-खाने की कोई कमी नहीं है, पर उसकी बीवी मीता (सबा क़मर) का सारा ध्यान बस इसी एक कोशिश में रहता है कि उनकी बेटी पिया का एडमिशन कैसे भी दिल्ली के सबसे महंगे स्कूल में हो जाये. इसके लिए जरूरी है कि माँ-बाप न सिर्फ अमीर हों, अमीर दिखें और लगें भी. शुरुआत हो चुकी है, राज को अपने चांदनी चौक की गलियाँ छोड़कर वसंत विहार जैसे पॉश इलाके में घर लेना पड़ेगा. उसके बाद ‘द सूरी’ज़’, ‘द मल्होत्रा’ज़’ जैसे अमीरों से मेल-जोल बढ़ाना, ताकि पिया को अच्छी संगत मिले, और फिर स्कूल के इंटरव्यू की तैय्यारी. इंग्लिश में तंग हाथ लिए बिचारे राज के लिए तो जान पर बन आई है, पर मीता हार नहीं मानने वाली. बड़ी उलट-फेर तब होती है, जब इतनी जद्द-ओ-जेहद के बाद भी पिया का एडमिशन नहीं होता, और अब बस एक ही रास्ता बचा है. स्कूलों में ‘राईट टू एजुकेशन’ एक्ट के तहत मिलने वाले गरीबी कोटा में गरीब बनकर अप्लाई करना.

    साकेत चौधरी बढ़ा-चढ़ाकर ही सही, पर आजकल के शिक्षा-जगत में फैली दुर्व्यवस्था पर हर तरीके और हर तरफ से व्यंग्यात्मक प्रहार करते हैं. मीता का इंग्लिश मीडियम स्कूलों को लेकर हद दर्जे का पागलपन अगर कई बार आपको झकझोरता है, तो कई बार झुंझलाहट भी पैदा करता है. फिल्म की शुरुआत में जब साकेत जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रहे राज और मीता की लव-स्टोरी दिखाने का तय करते हैं, उसकी जरूरत आपको आगे चल कर समझ आती है. जिंदगी से राज और मीता दोनों की अपेक्षाएं, उम्मीदें और ख्वाहिशें हमेशा एक-दूसरे से जुदा रही हैं. जहाँ ‘एलिट’ बनने की चाह मीता की आँखों में चमक ले आती है, वहीँ राज के लिए अच्छा पति, अच्छा पिता बने रहना ज्यादा मायने रखता है.

    फिल्म की कहानी में ठहराव और उबाल दोनों एक साथ तब आते हैं, जब परदे पर आपकी जान-पहचान श्याम (दीपक डोबरियाल) और उसकी बीवी (स्वाति दास) के किरदार से कराया जाता है. अपने बेटे के भविष्य के लिए उसकी पढ़ाई-लिखाई के प्रति जागरूक एक माँ-बाप ये भी हैं, जो गरीबी की मार सहते हुए भी कोशिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. जहां एक की बुनियाद में झूठी चमक-दमक है, इन माँ-बाप की जिद और धुन ईमानदारी की कसौटी पर पक्की और सच्ची है. हालाँकि अंत तक आते-आते, साकेत थोड़े तो नाटकीय होने लगते हैं, पर कमोबेश गुदगुदाते रहने की उनकी आदत पूरी फिल्म में एक सी ही रहती है. चूकते वो सिर्फ एक जगह हैं, जहां बात एक ही तराजू से सभी अमीरों और गरीबों को तोलने की आती है. सारे के सारे अमीर मुंहफट, बदतमीज़, सारे के सारे गरीब हमदर्द, मददगार.

    इरफान खान घर की दाल जितने जाने-पहचाने हो गए हैं अब. रोज मिलते रहें, तब भी आपको कोई कोफ़्त नहीं होगी, कोई शिकायत नहीं होगी. हाँ, अगर ज्यादा दिन तक न मिलें, तब तरसना बनता है. कपड़े की दुकान पर जिस तरह ग्राहकों से पेश आते हैं, या फिर अमीर-गरीब बनने के खेल के बीच जिस तरह झूलते दिखाई देते हैं, उनका हर एक्ट तीर की तरह वही लगता है, जहाँ के लिए निशाना लगाया गया था. फिल्म खुद बहुत ज्यादा संजीदा होने से बचती है, तो आप भी इरफ़ान से मनोरंजन की ही उम्मीद लगाईये, निराश नहीं होंगे. सबा अपने किरदार से आपको जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं, पर दीपक और स्वाति जिस दर्जे का अभिनय पेश करते हैं, आप उन्हें भूलने नहीं पाते. स्वाति अगर अपनी मौजूदगी मात्र से ही आपका ध्यान लगातार अपनी ओर खींचती रहती हैं, तो दीपक कुछ ख़ास पलों में बड़ी आसानी से आपकी आँखें नम कर जाते हैं. दीपक उन दृश्यों में भी कमजोर दिखाई नहीं पड़ते, जिनमें इरफ़ान भी मौजूद हों, और अभिनय में ये रुतबा बहुत कम अदाकारों को नसीब है.

    आखिर में; ‘हिंदी मीडियम’ एक ऐसी जरूरी फिल्म है, जो भारत के अपर मिडिल-क्लास की खोखली महत्वाकांक्षाओं पर हंसती भी है, हंसाती भी है.

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  2. Shubhra Gupta Site:Indian Express doesn't know how to review a film

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