Mukti Bhawan Movie Review|Bollymoviereviewz
Saturday, April 8, 2017

Mukti Bhawan Movie Review

Mukti Bhawan Movie Review

Mukti Bhawan Movie Review
Average Ratings: 3.87/5
Score: 100 % Positive
Reviews Counted: 8
Positive:8
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Ratings:4/5 Review By:Rajeev Masand  Site: CNN News18
Death, and the awareness of one’s mortality are key themes in Mukti Bhawan. Yet the film is a surprisingly charming father-son story filled with laughter and unexpected moments of tenderness and humanity.Mukti Bhawan is as much a celebration of life – complete with all its complexities and paradoxes – as it is a meditation on the harsh realities of getting old and dying. It is both poignant and uplifting.Beautifully shot and although languidly paced, Bhutiani delivers an evocative drama that has surely got to be one the best films you’ll see this year. I’m going with four out of five.
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Ratings:3.5/5 Review By:Anupama Chopra  Site: Filmcompanion
Mukti Bhawan is a film about death but it teaches you about life. On the Ghats of Banaras, amidst corpses, debris, ancient rituals and ruins, director Shubhashish Bhutiani finds joy, laughter, tenderness and a unique serenity. He tells his story with a measured pace and delicate hand. Mukti Bhawan has a stillness that is rare to find in the movies these days.Any film that can get you laughing about death deserves to be seen. I’m going with three and a half stars.
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Ratings:3.5/5 Review By:Shubhra Gupta  Site:Indian Express
There’s much to like about Mutki Bhawan. It brings to us themes which are either ignored or dealt with in our cinema with mawkishness and heavy sentimentality. Bhutiani removes the cloyingness and replaces it with a moving matter-of-fact acceptance of the final destination: this is a director to watch out for. Everyone makes us watch, particularly Adil Hussain, who is pitch-perfect. He is unshowy yet fully visible, and I couldn’t take my eyes off him.
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Ratings:3.5/5 Review By:Nihit  Site:Times Of India
The plot is too skimpy and with its languid pacing, the movie eventually seems a bit indulgent. The filmmaker’s exposure to slow, contemplative festival films becomes apparent. But the unassuming characters and the humour make it a delightful watch. If in-your-face Bollywood blockbusters have bored you to death, Mukti Bhawan is your salvation.
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Ratings:4/5 Review By:Sarit Ray  Site:Hindustan Times
In the end, rather than being about the heavy religious stuff, it is about universal human drama. As a father and son reconcile, it is near heart-breaking. As an old man and his grandaughter sneak out for bhang, it tells you that the most devout have mischief in them. Bhutiani gives death its due dignity, and yet retains its objectivity and subtlety. It makes you laugh, and cry, and think and question. It’s what good cinema and storytelling are meant to do.
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Ratings:4.5/5 Review:Saibal  Site:NDTV
Ageing and mortality lie at the heart of the achingly tender Mukti Bhawan. But, more than anything else, this subtly comic and profoundly wise film celebrates life and its complex truths and revelationsMukti Bhawan is a small, spry, sublimely beguiling essay that bears the weight of its solemn theme without the faintest hint of a stumble. If there is only one film that you want to see this week, this month, this year - or this lifetime - let it be this one.
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Ratings:4/5 Review:Sukanya  Site:Rediff
As his worldly-wise significant, she may no possess much depth or soul mate fodder but Geetanjali Kulkarni makes it well meaning enough not to be viewed unkindly. Bhutiani finds a perfect antidote to their complexities in Palomi Ghosh’s radiant presence. Death scares, but the journey to Mukti Bhawan is strangely elevating in its perception of life and beyond.
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Ratings:4/5 Review:Udita Site:Firstpost
The concept of preparing for a peaceful passing in the most blessed place in India is life affirming and comforting. It’s no easy task dealing with the inevitability of death, with the subject of losing a parent and balancing that with humour, warmth and gratitude. This is the most significant achievement of Bhutiani’s debut feature.
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Mukti Bhawan ( Hotel Salvation) Story:  

A son reluctantly accompanies his dying father on a trip.

Mukti Bhawan  Release Date:

April 7 2017 ( India)

 Director:   Shubhashish Bhutiani

 Producer:     Sanjay Bhutiani, Sajida Sharma

Cast:
Lalit Behl, Adil Hussain, Geetanjali Kulkarni, Palomi Ghosh
Run Time:  1 hours and 39 Minutes


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1 comments:

  1. मुक्ति-भवन:
    दर्शन-चिंतन और मनोरंजन का बेहतरीन मेल-मिलाप! [4.5/5]

    जो बनारस के करीब हैं, या बनारस जिनके दिल के करीब है, वो इस अनुभव की पुष्टि खुले दिल से करेंगे कि मृत्यु को लेकर जितना जंजाल, जितना हो-हल्ला, जितना झमेला, जितना ऊल-जलूल हौव्वा हमने अपने दिमाग में पाल रक्खा है; बनारस किसी कारगर दवा की तरह एक ही ख़ुराक में सब हर लेता है. मृत्यु को मात्र एक प्रक्रिया मानकर, शांत-चित्त से देखने और जीने का गुर सीखना हो, तो नाव पर बैठकर बनारस के घाटों को बस एकटक निहारते रहिये. शुभाशीष भूटियानी की ‘मुक्ति-भवन’ कुछ ऐसा ही दुर्लभ, गहन, पर रोचक अनुभव परदे पर पेश करती है, जहां मौत की अवधारणा जिन्दगी के आम उतार-चढ़ाव से कहीं ज्यादा शांत और मनोरंजक लगती है.

    बाबूजी (ललित बहल) को एक ही सपना बार-बार दिखाई देने लगा है. उनकी मानें, तो अब उनके (पहले बनारस, और फिर मर कर ऊपर) जाने का वक़्त आ गया है. हालाँकि उनकी बहू (गीतांजली कुलकर्णी) को ये सब बस घूमने-फिरने के चोंचले लगते हैं. इन सब में बेटे राजीव (आदिल हुसैन) की मुश्किलें बढ़ गयी हैं. बाबूजी के साथ बनारस के मुक्ति-भवन में रहना पड़ेगा, जहां बाबूजी जैसे और भी लोग हैं जो मोक्ष-प्राप्ति के लिए बनारस में ही अपनी मृत्यु की राह जोह रहे हैं. विमलाजी (नवनिन्द्र बहल) को तो 18 साल हो गये, हर 15 दिन बाद नाम बदल कर मुक्ति-भवन में ही टिकी हैं. राजीव को शायद इतना इंतज़ार न करना पड़े, मुक्ति-भवन के कर्ता-धर्ता मिश्राजी (अनिल रस्तोगी) देख कर ही बता देते हैं कि किसका वक़्त नज़दीक है?

    शुभाशीष भूटियानी फिल्म के यथार्थवादी कथानक को पूरी तरह तवज्जो देते हुए, बनारस में होते हुए भी अति-लोकप्रिय दृश्यों और अति-प्रचलित प्रतीकों के जरिये बनारस को परदे पर दोहराने से बचते हैं. उनका बनारस छोटे-छोटे सीलन भरे कमरों, तंग गलियों, संकरी सीढ़ियों और खुली छतों के किनारों से गंगा को ताकने तक ही खुद को सीमित रखता है. यहाँ तक कि उनका कैमरा गंगा-आरती जैसे मनोरम, दैविक और दर्शनीय पलों के वक़्त भी अपने जमीनी किरदारों के हाव-भाव पर ही ज्यादा केन्द्रित रहता है. शुभाशीष अपने हलके-फुल्के व्यंग्य और खालिस असली किरदारों के साथ सिनेमा और वास्तविक जिन्दगी का फर्क सा ही मिटा देते हैं. मौत के इंतज़ार में बेटा सोते हुए बाप की सांस टटोल रहा है, और बाप है कि मृत्यु-शैय्या पर लेटे-लेटे भी भजन-मंडली को सुर में गाने की सलाह दे रहा है. बुजुर्ग बाप और अधेड़ उम्र के बेटे के बीच की ख़ामोशी भी बहुत बार बहुत कुछ बोलती सुनाई देती है. विमलाजी जब बाबूजी से कहती हैं, “मुझे जलन होती, अगर आप यहाँ आये इतनी जल्दी मर जाते” तो अचानक मौत जैसे एक ही साथ बहुत हलकी और गहरी दोनों लगने लगती है. ऐसे ही एक मार्मिक पल में, घिसे-पिटे, खानापूर्ति के लिए अख़बार में छपवाए गए शोक-संदेशों से ऊब कर, ‘मुक्ति-भवन’ के सारे बूढ़े-बुजुर्ग अपनी-अपनी मृत्यु का शोक-संदेह खुद ही लिखने बैठ जाते हैं.

    ‘मुक्ति-भवन’ अदाकारी में एक अध्याय की तरह देखा जाना चाहिए. आदिल हुसैन की अकुलाहट, उकताहट और सकुचाहट उनकी आँखों की गहराई से निकलती है, और आपको अन्दर तक छू जाती है. कितनी ही बार उनका चेहरा पूरे स्क्रीन पर बिना कुछ कहे, पूरी तसल्ली के साथ अपनी बेचैनी बयाँ कर जाता है. बनारस की गलियों और घाटों पर भटकते हुए बड़ी तल्लीनता और सजगता से आदिल एक नामचीन कलाकार से आगे बढ़कर, महज़ एक चेहरा, एक किरदार बन भीड़ में खो जाते हैं. ललित बहल के अभिनय में ठहराव फिल्म की रफ़्तार से पूरी तरह कदम मिला कर चलती है. नवनिन्द्र और अनिल रस्तोगी अपने अपने हिस्सों को इतनी सुगमता से जीते हैं कि उन्हें परदे पर बार-बार देखने की तलब होने लगती है. गीतांजलि कुलकर्णी और उनकी बेटी की भूमिका में पलोमी घोष कम वक़्त के लिए ही सही, पर परदे पर अपने सधी अदाकारी से प्रभावित करने में सफल रहती हैं.

    आखिर में; ‘मुक्ति-भवन’ जीवन-मृत्यु के घोर-चिंतन और रिश्तों की पेचीदगी को बड़ी परिपक्वता और पूरी संजीदगी से कुछ इस तरह परदे पर जिंदा करती है, कि आप जिंदगी से कहीं ज्यादा मौत के फ़लसफ़े का आनंद लेने में मग्न रहते हैं. फिल्म में मिश्राजी बिना बात राजीव को मशवरा देते हैं, “आप पान खाया कीजिये!”, ‘मुक्ति-भवन’ के लिए मैं भी कुछ ऐसा ही कहूँगा, “देख आईये! कुछ बातों के लिये वजहें खोजने की जरूरत नहीं. कुछ बातों को वजहों की दरकार नहीं.” सिनेमाई परदे पर जीवन-मृत्यु को लेकर दर्शन-चिंतन और मनोरंजन का इतना सटीक मेल-मिलाप पिछली बार रजत कपूर की ‘आँखों-देखी’ में ही दिखा था. [4.5/5]

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