Trapped Hindi Movie Review| Taran Adarsh,Rajeev Masand,Komal Nahata, Anupama Chopra,Raja Sen |<crit:blog.title></crit:blog.title> Trapped Hindi Movie Review|Bollymoviereviewz
Friday, March 24, 2017

Trapped Hindi Movie Review

Trapped Hindi Movie Review

Trapped Movie Review
Average Ratings:3.45/5
Score:100% Positive
Reviews Counted:10
Positive:0
Neutral:1
Negative:0




Ratings:3.5/5 Review By:Rajeev Masand Site:CNN News 18
Although it’s only 103 minutes in running time, it’s true the film feels long and stretched, as movies of this genre – centered around a single character – usually do. Nail-biting moments, unfortunately, are too few. Yet despite its occasional shortcomings, Trapped is a wholly involving drama that you become quickly invested in. The bulk of the credit for that goes to the film’s incredible leading man who delivers his finest work here. 
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Ratings:3.5/5 Review By:Anupama Chopra Site:Filmcompanion
Trapped is the ultimate urban nightmare. A man gets locked into an empty apartment in an empty Mumbai high-rise. He has no food, water or electricity. He does have a rat for company. There’s also a cockroach which ends up…you don’t want to know. With one actor, one location and a miniscule budget, director Vikramaditya Motwane creates a layered survival story. Beyond the immediate horror, Trapped is also a piercing portrait of a beautiful but brutal Mumbai, where towering buildings loom like concrete carcasses.
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Ratings:2.5/5 Review By:Shubhra Site:Indian Express
The trouble with Trapped, in which Rao is practically a solo act, is that it is uneven. There are not enough genuinely scary heart-in-mouth moments. Shaurya’s despair stays mostly on the surface: we see his jeans getting loose, his ribs starting to show, the grime collecting on his body, but I wanted to see more of the soul. Rao is more than capable of stripping down to the essentials, and showing us the truth, which is why he is such a powerful actor. Here I couldn’t see enough of his insides.  
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Ratings:3.5/5 Review By:Raja Sen Site:NDTV
That unrehearsed feel, I suspect, was what Motwane was going for. He's a filmmaker who made a small, much loved gem in Udaan, and then a giant period drama called Lootera which I adored, but which ended up being watched by too few. Perhaps this, then, is the story of a director - trapped by big-budget pressures - who needed a small win. This one is a breakout.  
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Ratings:3.5/5 Review By:Saibal Site:NDTV
Trapped isn't an easy film to watch. It certainly isn't for the squeamish. But if rats and roaches do not sicken you and claustrophobia and acrophobia are only vague terms in your lexicon, do watch Trapped for its artistic audacity, if nothing else.  
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Ratings:3.5/5 Review By:Renuka Site:Times Of India
However, given the nature of the story, ‘Trapped’ does test your patience after a while. You also doubt the protagonist’s intelligence and sanity. Why would you rent a flat from a dubious agent, in an empty building? A few occurrences seem implausible. How come even fire doesn’t draw any attention? Nonetheless, the mounting tension makes you overlook these flaws and a bloated run time. ‘SH** happens’!  
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Ratings:3.5/5 Review By:Rohit Site:Hindustan Times
Motwane and Rao form a lethal team that keep us hooked for 102 minutes, quite easily. Trapped is unique because it’s unlike any other one-room drama. It remains a personal story, more like a leaf out of Shaurya’s life than a cinematic celebration of a survivor. Trapped is a defining film for Motwane who has become braver in using small spaces and silence. It’s the beginning of a style that we must see in his next films. No interval release is going to make you understand Trapped better.  
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Ratings:4/5 Review By:MayankSite:Mid Day
That 'Trapped' manages to grippingly hold your attention with such an underwhelming setting is an achievement in itself. That it could invade your senses makes it worth every minute, without any break, in the theatre.  
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Ratings:4/5 Review By:Kunal Site:Mumbai Mirror
Director Vikramaditya Motwane deserves credit, not just for delivering on the construct, but for opening doors to filmmakers who will now dare to pitch a concept without worrying about the traditional yardsticks that govern the commerce of cinema. This one is not for the faint hearted, especially if you have a disproportionate fear of rodents. But for the rest, being confined to this celluloid seclusion makes for a thrilling affair.  
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Ratings:3/5 Review By:Surbhi Site:Koimoi
Vikramaditya Motwane’s story has no timeline and in certain cases, the story fumbles with its cinematic liberties.This gripping story has no space for a popcorn refill. Get trapped in this one! (The film will be screened without intervals) Trapped is no regular movie and hence not everyone will enjoy it. Those having a penchant for survival dramas will find it intriguing enough.  
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Trapped  Story:  

A man gets stuck in an empty high rise without food, water and electricity.

Trapped  Release Date:

March 17 2017 ( India)

 Director:   Vikramaditya Motwane

 Producer:    Madhu Mantena, Vikas Bahl, Anurag Kashyap

Cast:
Rajkummar Rao as Shaurya
Geetanjali Thapa as Noorie

Run Time:  1 hours and 45 Minutes


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1 comments:

  1. ट्रैप्ड:
    हिंदी सिनेमा का एक नया अध्याय! [4/5]

    दो दुनिया है यहीं कहीं, इक अदृश्य रेखा से बंटी-कटी. जब आप इधर नहीं होते, तो उधर होते हैं; उधर नहीं तो पक्का इधर. एक दुनिया, जहां बहरे होते जा रहे हैं हम. जरूरतों के पीछे की अंधाधुंध दौड़ में, मानवीय संवेदनाओं को सुनने-समझने-देखने की ताकत खोते जा रहे हैं. भीड़ का शोर दूसरी दुनिया से आ रही उस एक अदद आवाज़ को हमारे कानों तक पहुँचने ही नहीं देता, जिस से जुड़ कर हम खुद को ही खोने से बचा सकते हैं. इस दुनिया में, कानों पे एक अलग ही किस्म का रेडियो चिपका रक्खा है हम सभी ने, फरमाईशी फ़िल्मी संगीत का छलावा जिसमें जोरों से थाप दे रहा है. यहाँ अपनी अपनी छतों पे चढ़ कर आसमान में आँखें बोने का चस्का तो सभी को है, पर मदद की गुहार में ज़मीनी सतह से उठते दूसरी दुनिया के हाथ चाह कर भी हमें दिखाई नहीं देते.

    मजेदार है कि दूसरी तरफ भी हमीं हैं. इस भीड़ भरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाने का डर पाले, बंद कमरे के अन्दर से दरवाजे पीटने, खिड़कियों की सलाखें पकड़ के ‘बचाओ-बचाओ’ चीखने को मजबूर. जाल और जंजाल तो दोनों ही तरफ हैं, मगर इस दुनिया का संघर्ष तोड़ कर रख देता है. सामाजिक मान्यताओं के खंडन से लेकर व्यक्तिगत पराक्रम की पराकाष्ठा तक, सब कुछ अपने चरम पर. विक्रमादित्य मोटवाने की ‘ट्रैप्ड’ एक ऐसी ही सशक्त फिल्म है, जो एक बंद कमरे के सीमित दायरे में घुटती, लड़ती, जूझती और अंततः जीतती जिन्दगी के हौसले का सम्पूर्ण सम्मान और सत्कार करती है. हॉलीवुड में भले ही आपने ‘127 आवर्स’ या ‘बरी’ड’ जैसी फिल्में बहुत देखी हों, हिंदी सिनेमा में इस तरह का प्रयास अपनी तरह का एकलौता है, और बेहतरीन भी.

    मुंबई जैसे महानगर में शौर्य (राजकुमार राव) जैसे नौकरी-शुदा प्रेमियों के लिए शादी की पहली शर्त, रहने का एक अच्छा ठिकाना ही होती है. नूरी (गीतांजलि थापा) अब उसके दोस्तों की जमात वाले एक कमरे के फ्लैट में तो रहने से रही. खैर, जुगाड़ काम आया और शौर्य को 35वें फ्लोर पर एक सही फ्लैट मिल गया है. भीड़-भाड़ वाला इलाका है, पर बिल्डिंग एकदम सुनसान. कानूनी मामलों में फँसी ऐसी बियाबान इमारतें मुंबई जैसे महानगरों में हैरत की बात नहीं, पर किसे अंदाज़ा था कि अगली ही सुबह जब शौर्य गलती से अपने ही फ्लैट में कैद हो जाएगा, तो उसके लिए वहाँ से निकलने में 21 दिन लग जायेंगे? मैं जानता हूँ, आप इस एक लाइन के ख़त्म होते-होते तक अपने उपायों, सवालों और सुझावों की लम्बी फेहरिस्त के साथ तैयार हो जायेंगे कि ऐसा होना कितना नामुमकिन है, खास कर मुंबई जैसे शहर और आजकल के प्रबल तकनीकी दौर में? पर विक्रमादित्य मोटवाने जैसे ठान कर बैठे हों कि आपको मनवा के ही छोड़ेंगे. और उनकी इस कोशिश में उनका पूरा-पूरा साथ देते हैं राजकुमार राव. उनकी झल्लाहट हो, डर हो, खीझ हो, विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की जिद हो या फिर नाउम्मीदी में टूट कर बिखरने और फिर खुद को समेट कर उठ खड़े होने का दम; राव अविश्वसनीय तरीके से पूरी फिल्म को अपने मज़बूत कंधे पर ढोते रहते हैं. फिल्म की दमदार कहानी, अपने सामान्य से दिखने वाले डील-डौल की वजह से राव पर हमेशा हावी दिखाई देती है, जिससे दर्शकों के मन में राव के किरदार के प्रति सहानुभूति का एक भाव लगातार बना रहता है, पर धीरे-धीरे जब राव अपने ताव बदलते हैं, फिल्म उनकी अभिनय-क्षमता के आगे दबती और झुकती चली जाती है.

    ‘ट्रैप्ड’ की सबसे बड़ी खासियत है, एक ही लोकेशन पर सिमटे रहने के बावजूद आपको घुटन महसूस नहीं होने देती. आप खुद भी उस एक कमरे से बाहर निकलने की राह जोहते रहते हैं, पर ऐसा सिर्फ उस किरदार से जुड़ाव की वजह से होता है. बहरी बाहरी दुनिया का ध्यान खींचने के लिए, जब जब शौर्य कोई नयी जुगत लगाता है, आप उसके लिए तालियाँ पीटते हैं, पर जब कुछ भी काम नहीं आता, आप ही उसके साथ झल्लाते भी हैं. मोटवाने अपने लेखकों के साथ मिलकर इतनी मुस्तैदी से सारा ताना-बाना बुनते हैं कि शिकायत करने को ज्यादा कुछ रह नहीं जाता. घर को आग के हवाले कर देने से लेकर, खून से तख्तियां लिख-लिख कर बाहर फेंकने, यहाँ तक कि टीवी को खिड़की से नीचे गिराने तक की सारी जद्दो-जेहद आपको इस ‘बिना इंटरवल की फिल्म’ में शुरू से लेकर अंत तक कुर्सी से बांधे रखती है.

    आखिर में; ‘ट्रैप्ड’ भारतीय सिनेमा में ‘सर्वाइवल ड्रामा’ का एक नया अध्याय बड़ी ईमानदारी और पूरी शिद्दत से लिखती है. किशोरावस्था की चुनौतियों से लड़ते ‘उड़ान’ और परदे की क्लासिक प्रेम-कहानियों को याद करती ‘लुटेरा’ के बाद; विक्रमादित्य मोटवाने की ये छोटी सी फिल्म हिंदी सिनेमा के बड़े बदलाव का एक अहम् हिस्सा है. एक ऐसी फिल्म, जिस पर फ़िल्मी दर्शक के रूप में आपको भी नाज़ होगा. कुछ ऐसा जो आपने हिंदी सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा; तो जाईये, देख आईये! [4/5]

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