Waiting Movie Review|Bollymoviereviewz
Wednesday, June 1, 2016

Waiting Movie Review

Waiting Hindi Movie Review

Waiting Hindi Movie Review
Average Ratings:3.28/5 
Score: 100% Positive 
Reviews Counted: 8
Positive: 8
Neutral: 0
Negative: 0


Ratings:3/5 Review By: Rajeev Masand Site:CNN IBN
Despite its problems – and there are a few – Waiting is well worth your time. It sags post intermission, and the plotting is weak. But it raises important questions about life, love, and letting go. Plus there are those two splendid performances. That’s plenty to merit a viewing. I’m going with three out of five.
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Ratings:-- Review By: Komal Nahta Site:Zee ETC Bollywood Business
On the whole, Waiting is not a universally-appealing film and although it will win accolades and acclaim for its unique story, great performances, and beautiful narration, it will not get any box-office rewards whatsoever.
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Ratings:3.5/5 Review By: Sukanya Verma Site:Rediff
Director Anu Menon’s Waiting, a tender tale of love and letting go, recognises this largely neglected sentiment and builds its premise around two strangers bonded by despair. Stuck in a loop, it’s a privilege Tara and Shiv don’t have as they take refuge in anticipation till crisis has its closure and memories turn into nostalgia.
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Ratings:2.5/5 Review By: Shubhra Site:IndianExpress
This is an apt one-line description of a film about life, lasting love and impending loss which explores a zone Bollywood doesn’t bother with. Which is itself so refreshing that you want to champion the attempt, as well some of the outcome, even if it doesn’t hit all the marks, all the way.
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Ratings:3.5/5 Review By: Rohit Vats Site:Hindustan Times
The movie traces two strangers – Tara and Shiv – who develop a heartwarming bond as they struggle through the long wait for their spouses to recover in a hospital. Directed and written by Menon, the movie is a warm narrative about an otherwise heart-rending situation that Bollywood would love turning into an unending melodramatic trip.
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Ratings:3.5/5 Review By: Mohar Basu Site:Times Of India
It is commendable that director Anu Menon has whipped up a warm tale about love, loss and surviving life's catastrophic blows, with such simplicity. However, the writing wears thin in the latter half. Shiv's big revelation was unnecessary and the writers seemed unsure how to end it for Tara. And yet, none of it matters. For Kalki and Naseer's effortless performances, this movie deserves to be watched.
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Ratings:3.5/5 Review By: Saibal Chaterjee Site:NDTV
Waiting hinges on the unlikely bond that develops between a retired Kochi professor and a young Mumbai woman who are yoked together by a tragic turn of events and compelled to view existence in a new light. Waiting is beautiful and believable, a well-chiselled marvel that is watchable all the way.An understated and superbly acted film about loss, grief and the human need to cling on to the physical presence of loved ones, Anu Menon's Waiting is at once heart-wrenching and uplifting.
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Ratings:3.5/5 Review By: Surabhi Redkar Site:Koimoi
Waiting is a clear sign of mint-fresh direction. Lovable and relatable characters etched into a fine story makes this one a great slice of a life film!.Waiting is a delightful film that breaks the norms of soppy emotional dramas to present something real. For the stellar performances by Kalki and Naseerduddin Shah, I am going with a 3.5/5 for the film.
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Waiting Story:  

The film revolves around an unlikely friendship between two individuals who meet at a hospital while nursing their spouses in a comatose state.

Waiting Release Date:

May 27 2016

 Director: Anu Menon

 Producer:  Priti Gupta Manish Mundra

Cast:
Naseeruddin Shah
Kalki Koechlin
 Rajat Kapoor

Run Time:  1 hours and 39 Minutes

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Waiting Movie Review
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1 comments:

  1. वेटिंग (A):
    नसीर-कल्कि का अभिनय ही काफी है! [3/5]

    अस्पताल के ‘वेटिंग रूम’ में खाली कैनवस जैसी बेदाग़-बेरंग दीवार पे टंगी घड़ी में सिर्फ छोटी-बड़ी दो सुईयां ही नज़र आ रही हैं. सही, सटीक और तय वक़्त जानने के लिए घंटों की गिनती और उनके बीच के मिनटों के फ़ासले जैसे किसी ने रबर से मिटा दिए हों. यहाँ इनकी कोई ख़ास जरूरत भी नहीं है. जब इंतज़ार का रास्ता लम्बा हो तो घंटे-मिनट-सेकंड वाले छोटे-छोटे मील के पत्थरों को नज़रअंदाज़ करना ही पड़ता है. कुछ ने इस फ़लसफ़े को अच्छी तरह समझ लिया है, जैसे प्रोफेसर शिव नटराज [नसीर साब] जिनकी पत्नी पिछले आठ महीनों से कोमा में हैं. तारा देशपांडे [कल्की] के लिए अभी थोड़ा मुश्किल है. शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे और आज तारा का पति [अर्जुन माथुर] एक रोड-एक्सीडेंट के चलते आईसीयू में भर्ती है. दुःख को झेलने-सहने और समझने के अलग-अलग पड़ाव होते हैं, प्रोफेसर अगर आख़िरी पड़ाव पर हैं तो तारा के लिए अभी शुरुआत ही है.

    अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं. ‘नम्यो हो रेंगे क्यों’ का जाप करने वाली तारा कभी खुद को नास्तिक कहलाना पसंद करती थी, कौन मानेगा? वहीँ प्रोफ़ेसर को आज ‘एफ़-वर्ड’ कहने में भी कोई दिक्कत पेश नहीं आती.

    ‘वेटिंग’ बड़ी ईमानदारी से और बहुत ही इमोशनल तरीके से इन दो किरदारों के साथ आपको ज़िन्दगी के बहुत करीब लेकर जाती है. हालाँकि अस्पताल जैसा नीरस-उदास और बेबस माहौल हो तो फिल्म के भी उसी सांचे में ढल जाने का डर हमेशा बना रहता है, पर अतिका चौहान के मजेदार संवाद हमेशा इस नीरसता को तोड़ने में कामयाब रहते हैं. फिल्म जहां एक तरफ बड़ी संजीदगी से आपको लगातार ज़िन्दगी और मौत से जुड़े कुछ अहम् सवालों के आस-पास खींचती रहती है, दूसरी ओर वो इस कोशिश में भी लगी रहती है कि आपका दिल नम रहे, चेहरे पर मुस्कराहट बराबर बनी रहे और आप बड़ी तसल्ली से तकरीबन सौ मिनट की इस फिल्म का पूरा लुत्फ़ लें.

    अभिनय में नसीर साब और कल्कि एक दूसरे को पूरी तरह कम्पलीट और कॉम्प्लीमेंट करते नज़र आते हैं. नसीर साब के साथ एक ख़ास सीन में, जहां दोनों एक-दूसरे पर बरबस बरस रहे होते हैं, कल्कि अपनी एक अलग छाप छोड़ने में सफल रहती हैं. नसीर साब के तो कहने ही क्या! मतलबी से दिखने वाले डॉक्टर की भूमिका में रजत कपूर, बनावटी दोस्त की भूमिका में रत्नाबली भट्टाचार्जी और बेबाक, दो-टूक सहकर्मी बने राजीव रविन्द्रनाथन जंचते हैं.

    सिनेमा बदल रहा है. सिनेमा से ‘अति’ विलुप्त होता जा रहा है. अनु मेनन की ‘वेटिंग’ भी इसी अहम् बदलाव का एक हिस्सा है. (इस तरह की) फिल्मों में नाटकीयता के लिए अब शायद ही कहीं कोई जगह बची है. कथानक से अब बेमतलब के ज़ज्बाती रंग हटने लगे हैं. जिसे जो कहना है, उसी लहजे से कह रहा है जिसमें उस किरदार की पैठ हो. तैयार रहिये, कई बार ये आपको विचलित भी कर सकता है. [3/5]

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