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Saturday, May 7, 2016

Traffic Hindi Movie Review

Traffic  Movie Review

Traffic Hindi Movie Review
Average Ratings:3.1/5 
Score: 0% Positive 
Reviews Counted: 5
Positive: 3 
Neutral: 0 
Negative: 2


Ratings:4/5 Review By: Saibal Chaterjee Site:NDTV
Hindi movie fans have clearly lucked out. Only four months into 2016, they have already been treated to three amazing true stories brought to the big screen with elan. Traffic extends the trend represented by Airlift and Neerja. Unfortunately, the director is no longer around to bask in the glory. He died in late February, aged only 41. Traffic, both the original and its Hindi version, will forever bear testimony to the magnitude of the loss that Pillai's untimely death represents for cinema. This is a fitting swan song: an unmissable film.
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Ratings:2/5 Review By: Shubhra Gupta Site: Indian Express
While I was engaged with the goings-on in the original, which borrows from ‘Amores Perros’ to craft multiple threads featuring multiple characters all converging on one point, I found myself tuning out in this one, because the crispness and the sense of urgency is missing. Even if you haven’t seen the first, which spun off remakes in Tamil and Kannada, this one stutters.
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Ratings:3.5/5 Review By: Meena Iyer Site:Times Of India
The characters and key-plot situations are seamlessly interwoven. There are some predictable playing-to-the-gallery religious sentiments introduced to get the desired results. But this can be overlooked because at it's core, this is a well-intentioned film with fine performances from its ensemble cast. Special mentions are reserved for Manoj Bajpayee and Jimmy Sheirgill, who are A-grade. Though, they're just in extended cameos; these two effortlessly rise above the length of their roles. You shouldn't make a detour to avoid this traffic.
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  Ratings:4/5 Review By: Sweta Kaushal Site: Hindustan Times
A remake of the 2011 Malayalam film by the same name, Traffic is about the victory of determination and goodwill over human insecurities. It is a rare gripping thriller in Bollywood that also touches the right emotional chords.
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Ratings:2/5 Review By: Abhijit Site: Koimoi
Disappointing direction and boring story which focuses on excessive emotional drama. Doesn’t give justice to the true events of the story.Traffic is a disappointing movie which fails to justify the true events. Boring, lengthy and more focused on a drama rather than the core topic of organ transplant in traffic conditions. Apart from Manoj Bajpayee’s sharp performance, the film has nothing to offer. My rating would be 2 out of 5 stars.
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Traffic  Story:  

A Mumbai television journalist meets with a fatal accident leaving him on a ventilator. In Pune, a young girl can only be saved if she gets a transplant. The mission of transporting the organ is entrusted to a traffic constable, looking to earn his stripes back! A remake of the 2011 Malayalam film of the same name, Traffic deals with the vagaries of destiny


Traffic  Release Date:

May 6 2016

 Director: Rajesh Pillai

 Producer:  Deepak Dhar Sameer Gogate Sameer Rajendran

Cast:
Jishnu Manoj Bajpayee as Godbole, a traffic police constable
Jimmy Shergill as the City Police Commissioner
Prosenjit Chatterjee as superstar Parambrata Chatterjee Able, cardiac surgeon
 Sachin Khedekar as Vishal singh's father
Vishal Singh as Reyhan, a journalist trainee
Amol Parashar as Rajeev, Reyhan's friend

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1 comments:

  1. ट्रैफिक: बैठे रहिये, बाजपेयी हैं ना! [3/5]
    दिवंगत राजेश पिल्लै की मलयालम सुपरहिट थ्रिलर ‘ट्रैफिक’ का हिंदी रीमेक आपको थिएटर की कुर्सी से बांधे रखने के लिए गिने-चुने विकल्प ही सामने रखता है, जिनमें से एक तो है फिल्म की हद इमोशनल स्टोरीलाइन, और मनोज बाजपेयी का बेहद सटीक, संजीदा और समर्पित अभिनय. तकनीकी दृष्टि से फिल्म के कमज़ोर पल हों या कथानक को रोमांचक बनाये रखने के लिए नाटकीयता भरे उतार-चढ़ाव, मनोज बड़ी मुस्तैदी, ख़ामोशी और शिद्दत से ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे पूरी फिल्म को अकेले खींच ले जाते हैं. हालाँकि अच्छे और नामचीन अभिनेताओं की एक पूरी जमात आपको इस फिल्म का हिस्सा बनते दिखाई देती है, पर एक मनोज ही हैं जिनसे, जिनके अभिनय से और जिनकी कोशिशों से आप लगातार जुड़े रहते हैं...हमेशा!

    सच्ची घटनाओं को आधार बना कर, ‘ट्रैफिक’ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत एक ऐसी दिलचस्प और रोमांचक कहानी आप तक पहुंचाती है, जहां जिंदगी तमाम मुश्किलों और मायूसियों के बावज़ूद आखिर में जीत ही जाती है. कभी न हार मानने वाले इसी इंसानी जज़्बे को सलाम करती है ‘ट्रैफिक’! फिल्मस्टार देव कपूर (प्रोसेनजीत चटर्जी] की बेटी को पुणे में जल्द से जल्द हार्ट ट्रांसप्लांट की दरकार है. पता चला है कि मुंबई के एक अस्पताल में एक ऐसा ‘पॉसिबल डोनर’ है जिसके जिंदा रहने की उम्मीद अब लगभग दम तोड़ चुकी है. माँ-बाप (किटू गिडवानी और सचिन खेड़ेकर) अपने बेटे को ‘दी बेस्ट गुडबाई गिफ्ट’ देने का मन बना चुके हैं पर मुंबई से पुणे तक १६० किलोमीटर की दूरी को ढाई घंटे में पूरा करने का बीड़ा कौन उठाये? ट्रैफिक हवलदार रामदास गोडबोले (मनोज बाजपेयी) के लिए ये सिर्फ ड्यूटी बजाने का मौका नहीं है. मिशन पर जाने से पहले वो अपनी बीवी से कहता है, “पता नहीं कर पायेगा या नहीं, पर घूसखोर का लांछन लेके नहीं जीना”.

    फिल्म पहले हिस्से में कई बार अपनी ढीली पकड़ और सुस्त निर्देशन से आपको निराश करती है, खास कर जब किरदार एक-एक कर आपके सामने बड़ी जल्दी-जल्दी में परोस दिए जाते हैं. फिल्म को तेज़ रफ़्तार देने के लिए, घटनाओं को घड़ी की टिक-टिक के बीच बाँट कर दिखाने का चलन भी बहुत घिसा पिटा लगता है. हालाँकि इंटरवल आपको हल्का सा असहज महसूस कराने में कामयाब होता है. दूसरे हिस्से में फिल्म जैसे एकाएक सोते हुए जग जाती है और बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगती है, पर फिर ड्रामा के नाम पर जिस तरह के उतार-चढ़ाव शामिल होने लगते हैं, उनमें गढ़े होने की बू दूर से ही नज़र आने लगती है. ऐसा लगता है मानो जिंदगी की ये दौड़ अब कोई सस्ती सी विडियो गेम बन कर रह गई है, जहाँ मुश्किलें जानबूझ के हर मोड़ पे और बड़ी होती जा रही हैं. मलयालम फिल्मों में वैसे भी ये कोई नया चलन नहीं.

    पियूष मिश्रा जैसे वजनी नामों के बाद भी ‘ट्रैफिक’ के संवाद उतने ही फीके और उबाऊ हैं, जितने उसके नामचीन कलाकारों के बंधे-बंधे बासी अभिनय. प्रोसेनजीत दा का किरदार जाने-अनजाने अनिल कपूर के इतना इर्द-गिर्द बुना गया है कि उससे बाहर उन्हें देख पाना मुश्किल हो जाता है. दिव्या दत्ता, किटू गिडवानी, जिम्मी शेरगिल, सचिन खेड़ेकर, परमब्रता चटर्जी सभी को हम पहले भी इस खूंटे से बंधे देख चुके हैं. सब अपने घेरे अच्छी तरह पहचानते हैं और उसे तोड़ने की पहल से बचते नज़र आते हैं.

    इतने सब के बाद भी, ‘ट्रैफिक’ अपने जिंदा जज़्बे, सच्ची कहानी के तमगे, कुछेक गिनती के ही सही सचमुच के रोमांचक पलों और मनोज बाजपेयी के मजबूत कन्धों के सहारे एक अच्छी फिल्म कहलाने की खुशकिस्मती हासिल कर लेती है. मनोज मिसाल हैं, संवाद अभिनय का एक अभिन्न अंग है, मात्र एक अभिन्न अंग...पूरे का पूरा अभिनय नहीं. देखिये, अगर उनके जरिये अभिनय के बाकी रंग भी देखने हों! देखिये, अगर एक थ्रिलर देखनी हो जिसमें दिल हो, एकदम जिंदा ‘धक-धक’ धड़कता हुआ! [3/5]

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