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Wednesday, July 1, 2015

Killa Marathi Movie Review

Killa Marathi Movie Review


Average Ratings 4.12/5
Reviews Counted: 4
Positive: 4
Negative : 0


From All the  Top Indian Critics reviews on the web



Ratings:5/5 Review By: Rajeev Masand Site:CNN IBN
Killa is as much a story of friendship, trust, forgiveness and grief. It makes some nice observations about childhood and the bond between a single parent and a child. You'll come out feeling a tinge of sadness, but also fully satisfied with how things turn out for our little hero. I'm going with a full five out of five for Avinash Arun's deeply moving film Killa. If there is such a thing as a perfect film, my vote goes to this one. Don't miss it. At any cost.
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Ratings:3/5 Review By: Shubhra Gupta Site:Indianexpress
The straight boy who learns to be crooked, the bad-boy gang that holds out the password, the mother who learns to negotiate tricky territories, are all excellent. Bhalerao we’ve seen before, and he’s a twinkly-eyed `badmaash’ who makes us smile; as also Subhash, who shows vulnerability and strength. Deodar, who’s never faced a camera before, wins us over. Some of the feelings that accompany a rites-of-passage film drop it into a familiar zone. In that respect, Umesh Kulkarni’s ‘Vihir’ and Vikramaditya Motwane’s ‘Udaan’ had a little more sharpness and growing-pain in their coming-of-age narratives. But for all that, ‘Killa’ will stay with me, for its spectacular setting, and for its boy.
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Ratings:4/5 Review By: Mihir BhanageSite:TOI
'Killa' is one of the best films to have hit screens this year and the global recognition at various film festivals that it received, stands as a precursor to the success after its theatrical release. The film comes with English subtitles and is not one to be missed under any circumstances by anyone.
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Ratings:4.5/5 Review By: Raja Sen Site:Rediff.com
Killa is a deep film with lofty ambitions, and there are parts -- like the unpredictability of a moment that ends in a bite of fish -- where the film soars jawdroppingly high.Yet, I suspect the scenes that leave you awestruck aren’t the point of Killa. This is even better. This is a film you should watch for its lovely, lovely lulls.
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Movie Name: Killa

Synopsis:The film revolves around an 11-year-old child who has a difficult time coping with the death of his father.
Release Dates: Jun 26, 2015

 Director: Avinash Arun

Running time: 1h 50m

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Killa Marathi Movie Review
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1 comments:

  1. किल्ला (मराठी):
    दोस्ती, ज़िन्दगी, और सिनेमा! [४/५]

    उम्र का कोई निश्चित पड़ाव हो जहां पहुँच कर लगे कि अब आप बड़े हो गए हैं, ऐसा दावा कोई नहीं कर सकता! हालाँकि १८ साल की उम्र संवैधानिक रूप से आपको बालिग बना सकती है पर सच तो यह है कि ज़िंदगी ने हम सभी के लिए एक अलग चक्रव्यूह की रूपरेखा पहले ही सोच रखी है। कभी-कभी बारिश की चार औसत सी दिखने वाली बूँदें भी आपकी बेजान-बंजर रूह तर कर जाती है, तो कभी सरकंडे की आग पर भुनी मछली का पहला अधपका सा स्वाद ही काफी होता है आपको उम्र के उस दूसरी तरफ ठेलने के लिए! अविनाश अरुण की 'किल्ला' हम सभी 'बड़े हो चुके' बच्चों को किसी बहुत चमकदार तो नहीं पर असरदार टाइम-मशीन की तरह हमारे उस 'एक साल' में ले जा छोड़ती है, जिसकी धुंधली सी याद अब भी जेहन में किसी ढीठ किरायेदार की तरह जम के बैठी है।

    ११ साल के चिन्मय [अर्चित देवधर] के लिए कुछ भी आसान नहीं है. पिता को खोने का खालीपन बचपन को कुरेद-कुरेद कर खा ही रहा था कि अब माँ [अमृता सुभाष] के तबादले से उपजी नयी अजनबी-अनजान जगह की खीज़। चाहते न चाहते हुए भी चीनू को दोस्तों की एक दुकान मिल ही जाती है, उसके नए स्कूल में। बीच की बेंच पर बैठने वाला वो मस्तमौला-घुड़कीबाज़-शरारती बंड्या [पार्थ भालेराव], सबसे पीछे बाप के पैसों से सजा-सजाया युवराज और एक-दो 'हर बात में साथ' साथी। कोई याद आया? एक पुराना सा सीलन लिए नाम तो जरूर कौंधा होगा, आखिर हम सब हैं तो एक ही मिट्टी की पैदावार।

    'किल्ला' एक मासूम, पर उदास मन की संवेदनाओं का सहेजने योग्य दस्तावेज़ है। नए परिवेश से जुड़ने की मजबूरी और न जुड़ पाने की कसक चिन्मय के रवैये में जिस तरह नज़र आती है, खुद को टूटने से रोक पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। माँ की भी अपनी उलझनें कुछ कम नहीं हैं। नौकरी में बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोगों के दबाव और अकेलेपन की कचोट के बीच पिसती अरुणा फिर भी अपनी पनीली आँखों में काफी कुछ बाँधे रखती है। दीवार पर गालियां लिखने और समंदर से केकड़े पकड़ कर बाजार में बेचने की शरारतों के बीच चिन्मय का अकेले पड़ जाने का डर तब खुलकर सामने आता है, जब मूसलाधार बारिश के बीच उसके दोस्त उसे एक भयानक से दिखने वाले सुनसान किले में अकेला छोड़ आते हैं। 'किल्ला' को 'किल्ला' होने की ऊपरी वजह शायद तभी मिलती है पर यह फिल्म उससे कहीं बढ़कर है. फिल्म खत्म होने से पहले कई बार अपना अंत तलाशती नज़र आती है, और अंत में जब खत्म होती है तो एक नयी शुरुआत की उम्मीद के साथ!

    'किल्ला' मेरे लिए किरदारों से ज्यादा लम्हों की फिल्म है. छोटी-छोटी झलकियों में सिमटती-आसमान में खुलती खिड़कियों से झांकती एक बड़ी फिल्म। एक हलकी सी मुस्कान, एकटक तकती आँखों का रूखापन, लहरों के थपेड़े सहती एक बंद मोटरबोट, बारिश में दीवार से लगी एक साईकिल, एक भिगो देने वाला 'सॉरी' और पीछे छूटता बचपन, जो शायद ही कभी छूटता हो! अमृता सुभाष बेहतरीन हैं. अर्चित देवधर चिन्मय की बारीकियों को परदे पे एक सधे हुए अदाकार की तरह बखूबी उकेरते हैं. पार्थ भालेराव को 'भूतनाथ रिटर्न्स' में आप पहले भी देख चुके हैं, 'किल्ला' में एक बार फिर वो आपको गुदगुदा कर लोटपोट कर देंगे।

    'साल की सबसे अच्छी मराठी फिल्म' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार का तमगा लिए, अविनाश अरुण की 'किल्ला' ज़िंदगी की किताब का वो पन्ना है जिसे आप बार-बार पढ़ना चाहेंगे। वो भूली हुई डायरी, जो आज भी हाथ लग जाए तो आप सब कुछ छोड़-छाड़ के बैठ जाएंगे, उसके कुछ किरदारों से दुबारा उसी गर्मजोशी से मिलने के लिए! जरूर देखिये, सिनेमा के लिए-दोस्ती के लिए-ज़िंदगी के लिए! [४/५]


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