Zed Plus Review|Bollymoviereviewz
Wednesday, December 3, 2014

Zed Plus Review

Zed Plus Rating: 2.5/5

From All the  reviews on the web

Showing Top 5 Reviews

Zed Plus Hindi Movie Review



Ratings:1.5/5 Review By: Gavin Rasquinha Site:Times Of India (TOI)
In time, Aslam gets used to his status and the power goes to his head. He is then persuaded into chasing political ambitions. How he copes with it comprises the rest of the film. The narrative, while apparently authentic is overly long, unfocused and takes too long to get to the point to depict its satirical content. The subject matter could have been interesting but it is mired in tedious, very boring, rural and regional cliches that audiences have already seen, so many times.
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Ratings:-- Review By: Komal Nahta Site: Zee ETC Bollywood Business
On the whole, Zed Plus is a political satire which is well-made and which has some truly fine performances but as far as its commercial prospects are concerned, they are almost nil because the film will find appreciation among a very thin minority, referred to as the high gentry audience in a handful of big cities only.
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Ratings:3/5 Review By: Sukanya Verma Site:Rediff
Considering how every brand of idiocy attempts to acquire legitimacy in our country, the conjecturing in Zed Plus doesn’t seem far-fetched.What is undeniably heartening is that Zed Plus allows a bunch of talented actors to rise above second rung roles and take centre stage. Unlike him, Zed Plus may not be perfect but it doesn’t insult your intelligence like most Friday fare.
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Ratings:2/5 Review By: Shubhra Gupta Site:Indian Express
Zed Plus turns out to be a mildly engaging but overall patchy attempt at political satire from the man who gave us the memorable Doordarshan serial Chanakya. The good news is that there are still people attempting a satirical look at power and pelf and politics, and seeing how the public and personal intersects. The bad news is that it is not effective enough.
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Ratings:3.5/5 Review By: Martin D Souza Site:Glamsham
Whilst filming a political satire it's very easy to go overboard in trying hard to send your message across as well as pull in the laughs. But, it's difficult to speak your mind out [softly] and then move on without waiting for a reaction. Because you know, what you have said has already found its intended target!ZED PLUS is a film which falls in the latter category; without trying too hard Dr. Chandraprakash Dwivedi, of 'Chanakya' and PINJAR fame, belts out a classic without straining his, or any of his actors' vocal chords.
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2 comments:

  1. I personally feel Zed Plus is a classic, breezy, rib-tickling & meaningful Political satire that has come like a whiff of fresh air amidst the superficial potboilers that we are being subjected to watch these days and is a must watch for all real Cine-Maa lovers. If you have a penchant for good cinema and brilliantly made Political Satires, don't even dare to miss this one. This one is bound to bring smiles to your faces. For my detailed review, please visit.........http://rohitmoviereview.blogspot.in/

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  2. ज़ेड प्लस:
    आम आदमी की ख़ास कहानी! दिमाग लेकर जाएँ!! [3.5/5]

    कोई बॉलीवुड फिल्म एक छोटे से गाँव में अपना बसेरा बना ले, हंसती हुई कहानियों में चुभने वाले व्यंग्य गढ़े और अपना नायक एक गरीब ईमानदार लेकिन इंसानी फ़ितरतों से कूट कूट कर भरे हुए आम आदमी में तलाशे, ऐसा अक्सर तो नहीं होता! दूरदर्शन पर चाणक्य से प्रसिद्धि पाने वाले डॉ. चंद्रप्रकाश द्धिवेदी की नयी फिल्म 'ज़ेड प्लस' का नायक लुंगी और हवाई चप्पल में साइकिल के पंचर बनाने वाला एक आम आदमी तो है, पर उसकी कहानी आम बिलकुल नहीं। डॉ. द्धिवेदी फिल्म की शुरुआत में ही साफ़ कर देते हैं, "ऐसा दुनिया की किसी भी डेमोक्रेसी में होना नामुमकिन है".

    राजस्थान के फतेहपुर में असलम [आदिल हुसैन] अपनी बीवी हमीदा [मोना सिंह] और माशूका सईदा के साथ मज़े की ज़िंदगी गुज़ार रहा है. जो थोड़ी बहुत परेशानियाँ हैं उनमें उसका पड़ोसी शायर दोस्त हबीब [मुकेश तिवारी] अव्वल नंबर पे आता है, जो खुद सईदा का आशिक़ है और अब असलम से उसकी बिलकुल नहीं बनती। ज़िंदगी रफ़्तार तब पकड़ती है जब सरकार बचाने की मन्नत लिये प्रधानमंत्री [कुलभूषण खरबंदा] फतेहपुर में पीपल वाले पीर बाबा की दरगाह पर चादर चढ़ाने पहुंचते हैं. असलम का उनसे मिलना, अपने पड़ोसी से जान का खतरा होने की बात करना, प्रधानमन्त्री का पड़ोसी से 'पाकिस्तान' का मतलब निकालना और फिर असलम को ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैय्या करवाना, इन सब में आपको कहीं न कहीं राजनीतिक व्यंग्य की बहुत सारी मिसालें मिलेंगी और लगातार गुदगुदाती रहेंगी। खैर कहानी यहां रूकती नहीं और दिलचस्प मोड़ ले लेती है. जाने-अनजाने की ये जेड सुरक्षा धीरे धीरे असलम के जी का जंजाल बन जाती है और इस से निजात पाने की लगातार कोशिश में वो खुद गन्दी राजनीति का शिकार बनने लगता है.

    'जेड प्लस' बहुत ही मज़ेदार तरीके से व्यवस्था-तंत्र और राजनीतिक गलियारों की सांठ-गाँठ और समझ-बूझ का मज़ाक बनाती है, साथ ही आम आदमी की बेबसी और नासमझी पर भी खासा व्यंग्य कसती है. फिल्म के एक दृश्य में प्रधानमन्त्री अपने सचिव [के के रैना] को 'पाकिस्तान' को 'पड़ोसी' कहने की हिदायत देते हैं, जो कि राजनीतिक दृष्टि से एक सुरक्षित कदम है. वहीँ असलम के घर को बंकर बनाये बैठे सेना के जवानों का धीरे-धीरे असलम के परिवार के साथ घुलते-मिलते देखना, अच्छा लगता है. फिल्म का एक और मजबूत पक्ष उसका आर्ट-डायरेक्शन और बोलचाल की शैली है जो कहानी को किरदारों से और किरदारों को माहौल से अलग नहीं होने देती। हालाँकि फिल्म के दूसरे हिस्से में ड्रामा व्यंग्य पर ज्यादा हावी होने लगता है, फिल्म ढीली और सुस्त पड़ने लगती है, साथ ही कहानी बार-बार खुद को दोहराने लगती है, फिर भी कलाकारों का सटीक अभिनय फिल्म को उसकी तमाम कमियों के बावजूद संभाल लेता है.

    आदिल हुसैन असलम के किरदार में उभर कर सामने आते हैं. उनका अभिनय सिर्फ किरदार के पहनावे को ही ओढ़ने में यकीन नहीं रखता बल्कि उसे अपने अंदर तक उतार लेता है जैसे आदिल असलम एक ही हों, हालाँकि कहीं कहीं उनका लाऊड हो जाना खलता है. मोना सिंह बखूबी अपनी एक्टिंग की छाप छोड़ जाती हैं ख़ास तौर पर फिल्म के आखिरी हिस्से में. मुकेश तिवारी जमते हैं. संजय मिश्रा पाकिस्तानी आतंकवादी सरगना के रोल में अपनी 'फंस गए रे ओबामा' वाले किरदार को ही दुबारा ज़िंदा करते हैं. कुलभूषण खरबंदा निराश करते हैं. के के रैना सहज हैं, समर्थ हैं.

    अंत में, डॉ. चंद्रप्रकाश द्धिवेदी की 'जेड प्लस' उन चन्द फिल्मों में से है जो अब भी सिनेमा को कहानी कहने का एक मज़बूत और कामयाब ज़रिया मानते हैं, न कि सिर्फ तकनीकी समझ की एक गैरजरूरत नुमाइश। देखिये, अगर कुछ अलग-कुछ अच्छा-कुछ सच्चा देखना चाहते हों! [3.5/5]

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